भारतीय फुटबाल की लहर से क्यों अनछुआ रहा है हिंदी हार्टलैंड

नई दिल्ली, 6 नवंबर (आईएएनएस)| क्रिकेट की तरह भारत में फुटबाल का भी लंबा इतिहास रहा है। भले ही फुटबाल में भारत अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर विश्व कप में खेलने जैसी बड़ी सफलता हासिल न कर पाया हो, लेकिन 1889 में अस्तित्व में आए मोहन बागान जैसे क्लब का अब तक बने रहना इसका संकेत है कि देश में अभी भी फुटबाल का एक अलग स्थान है।

एक समय था जब पूर्वोत्तर भारत, बंगाल, केरल और गोवा जैसे कुछ हिस्सों से ही देश को सर्वश्रेष्ठ फुटबाल खिलाड़ी मिलते थे, लेकिन पिछले कई वर्षो में इसमें बड़ा बदलाव आया है। आई-लीग और इंडियन सुपर लीग (आईएएसएल) के आने के बाद से देश के विभन्न भागों से प्रतिभाशाली फुटबाल खिलाड़ी उभरकर आगे आ रहे हैं। हालांकि, हिंदी हार्टलैंड अभी भी फुटबाल की लहर से अनछुआ रहा है।


उत्तरप्रदेश, उत्तराखंड, बिहार, हरियाणा, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान समेत कई अन्य हिंदीभाषी क्षेत्रों में अब तक फुटबाल के लोकप्रिय न होने का एक बड़ा कारण यह है कि विभिन्न स्टेट एसोसिएशन इस खेल को लेकर गंभीर नहीं है। 1941 में शुरू हुआ संतोष ट्रॉफी टूर्नामेंट भारतीय राज्यों के लिए सबसे महत्वपूर्ण फुटबाल प्रतियोगिता है। हालांकि, प्रमुख हिंदीभाषी राज्यों ने इस टूनामेंट में अबतक बेहद लचर प्रदर्शन किया है।

प्रतियोगिता में बेहतरीन प्रदर्शन करना तो दूर की बात उत्तर और मध्य भारत में स्थित इन राज्यों की टीमें पिछले कई वर्षो से संतोष ट्रॉफी में क्वालीफायर्स स्टेज से भी आगे नहीं बढ़ पाई हैं। पंजाब और दिल्ली को छोड़ दें तो उत्तराखंड ही केवल ऐसी टीम है जो पिछले पांच साल में एक बार इस प्रतिष्ठित टूर्नामेंट में क्वालीफायर्स स्टेज को पार कर पाई।

उत्तराखंड की टीम 2013-14 सीजन में क्वालीफायर स्टेज से आगे बढ़ी। हालांकि, ग्रुप-ए में वो एक भी मैच नहीं जीत पाई और चार हार के साथ आखिरी पोजिशन पर रहते हुए टूर्नामेंट से बाहर हो गई।


संतोष ट्रॉफी में इन सभी टीमों का खराब प्रदर्शन राज्य में फुटबाल की बेहद खस्ता हालत को दर्शाने के लिए काफी है। राज्यों में अकादमियों की कमी से लेकर मूलभूत सुविधाओं का आभाव है। टूर्नामेंट में भेजने के लिए टीम का चयन करने के उद्देश्य से राज्य स्तर पर कोई भी विशेष प्रतियोगिता आयोजित नहीं कराई जाती और केवल ट्रायल्स के दम पर खिलाड़ियों का चयन कर लिया जाता है। इन ट्रायल्स के जरिए चुने गए खिलाड़ियों पर बार-बार उम्र में धांधली करने के आरोप भी लगते रहे हैं।

फुटबाल की खराब स्थिति के कारण ही क्रिकेट, हॉकी और बैडमिंटन जैसे खेल इन क्षेत्रों में अधिक लोकप्रिय हैं और बच्चे भी इन्हीं की ओर आकर्षित होते हैं। हालांकि, निशु कुमार और अनिरुद्ध थापा जैसे कुछ खिलाड़ी हैं जो उत्तरप्रदेश और उत्तराखंड से निलकर राष्ट्रीय टीम के लिए खेलने में कामयाब रहे हैं। मुज़फ्फरनगर से ताल्लुक रखने वाले 21 वर्षीय निशु लेफ्ट-बैक पोजिशन पर खेलते हैं जबकि 21 वर्षीय थापा की पोजिशन मिडफील्ड है। इन दोनों खिलाड़ियों की कहानी बताती है कि इन राज्यों में मौजूद खिलाड़ियों में टैलेंट है बस उसे निखारने की जरूरत है।

इस स्थिति को बेहतर करने और देश में फुटबाल में अधिक प्रोफेशनलिज्म लाने के लिए अखिल भारतीय फुटबॉल महासंघ (एआईएफएफ) 2007 में आई-लीग और 2014 में आईएसएल को लेकर आया। इन दोनों लीगों में भी किसी क्लब ने हिंदीभाषी राज्य को रिप्रजेंट नहीं किया। यहां तक आई-लीग में राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली की भी कोई टीम नहीं दिखी। आईएसएल में जरूर दिल्ली डायनामोज ने हिस्सा लिया, लेकिन अब वह भी वित्तीय संकट और स्टेडियम में दर्शकों की संख्या में कमी के कारण नए नाम के साथ ओडिशा शिफ्ट हो गई है।

दिल्ली और उसके आसपास मौजूद राज्यों में फुटबाल की लगातार गिरती लोकप्रियता और शीर्ष स्तरीय क्लब का न होना महासंघ के लिए चिंता का विषय है। राजधानी में यूरोपीय फुटबाल को काफी फॉलो किया जाता है, लेकिन भारतीय फुटबाल की ओर फैन्स का उतना रुझान नहीं है। इसी कारण से डायनामोज को अपना बेस भी शिफ्ट करना पड़ा। एआईएफएफ ने भी इन इलाकों में खेल को आगे बढ़ाने के लिए कुछ खास कदम नहीं उठाए जिसके कारण राज्य संघ में अभी तक इस मुद्दे को लेकर गंभीरता नहीं है।

उत्तर-भारत में मौजूद राज्यों में पंजाब ही एकमात्र ऐसा क्षेत्र है जहां फुटबॉल का थोड़ा-बहुत कल्चर नजर आता है। बंगाल (32) के बाद सबसे अधिक संतोष ट्रॉफी के खिताब पंजाब ने ही जीते हैं। पंजाब ने आठ बार इस प्रतिष्ठित प्रतियोगिता का खिताब अपने नाम किया है जबकि आठ बार उसे फाइनल में हार झेलनी पड़ी है। खेल संस्कृति के लिए जाने-जाने वाले इस राज्य ने आखिरी बार 2007-08 में संतोष ट्रॉफी का खिताब अपने नाम किया था जबकि पिछले संस्करण में उसे सर्विसेस के खिलाफ फाइनल में हार झेलनी पड़ी थी।

पंजाब ने भले ही संतोष ट्रॉफी में दमदार प्रदर्शन किया हो, लेकिन राज्य में क्लबों की स्थिति लगातार खराब होती जा रही है। जेसीटी लुधियाना में स्थित एक प्रसिद्ध क्लब था। क्लब ने कई बड़े खिलाड़ी निकाले और अपने प्रोफेशनल्जिम के दम पर आगे बढ़ने का प्रयास किया।

हालांकि, वित्तीय परेशानियों के कारण 2011 में उसे अपनी दुकान बंद करनी पड़ी। कुछ वर्षो बाद मिनर्वा पंजाब उभरकर सामने आया और अब आई-लीग में खेल रहा यह क्लब भी परेशानियों से जूझ रहा है। क्लब के मालिक रंजीत बजाज लगातार क्लब के कुछ हिस्से को बेचने की बात कर रहे हैं और आईएसएल को देश में शीर्ष लीग का दर्जा मिलने के बाद उनके लिए इसे टालना बेहद मुश्लिक हो गया है।

आईएसएल में खेल रही जमशेदुपर एफसी के रूप में हिंदी भाषी राज्य को जरूर एक फुटबाल क्लब मिला है। हालांकि, अभी भी बहुत सारे ऐसे क्षेत्र हैं जहां पर क्लब का नामोनिशान नहीं है और इससे वहां की फुटबाल पर गहरा प्रभाव पड़ा है। सरकार जरूर खेल को लगातार आगे बढ़ाने की बात करती है, लेकिन सभी जानते हैं कि महासंघ के कड़े रवैये के बिना देश में फुटबाल आगे नहीं बढ़ सकता। एआईएफएफ इस मामले में भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड (बीसीसीआई) से सीख ले सकता है।

 

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