जन्मदिन विशेष: मानवीय मूल्यों को स्थापित करने वाले भीष्म साहनी, ‘तमस’ लिखकर सांप्रदायिकता को किया था बेनकाब

जन्मदिन विशेष: मानवीय मूल्यों को स्थापित करने वाले भीष्म साहनी, 'तमस' लिखकर सांप्रदायिकता को किया था बेनकाब

भीष्म साहनी (Bhisham Sahni) का नाम आते ही सबसे पहले उनकी रचना तमस याद आती है। साहित्यकार भीष्म साहनी (Bhisham Sahni) का जन्म 8 अगस्त 1915 में अविभाजित भारत के रावलपिंडी में हुआ था। आज उनकी जन्मतिथि है। वे मशहूर अभिनेता बलराज साहनी के भाई थे।

भीष्म साहनी (Bhisham Sahni) एक ऐसे रचनाकार थे, जो अपनी अद्‌भुत लेखन शैली और गहन समझ के कारण लोगों के बीच लोकप्रिय थे। वे पात्रों को इतनी गहराई से गढ़ते थे कि पढ़ने वाला उसमें रम जाता था। भीष्म साहनी (Bhisham Sahni) ने हमेशा अपने लेखन में मानव मूल्यों को स्थापित किया, इसलिए उन्हें आदर्शवादी लेखक भी कहा जाता है।


1975 में कालजयी रचना तमस के लिए मिला था साहित्य अकादमी पुरस्कार

भीष्म साहनी (Bhisham Sahni) की कालजयी रचना ‘तमस’ के लिए पूरा साहित्यजगत उन्हें हमेशा उन्हें याद करता है। इस उपन्यास का कई भाषाओं में अनुवाद हुआ है। भीष्म साहनी की यह रचना भारत-पाकिस्तान के विभाजन पर आधारित थी। भीष्म साहनी (Bhisham Sahni) को 1975 में तमस के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला था। इसी वर्ष वे पंजाब सरकार के शिरोमणि लेखक पुरस्कार से सम्मानित किए गए। उन्हें 1980 में एफ्रो-एशिया राइटर्स एसोसिएशन का लोटस अवॉर्ड और 1983 में सोवियत लैंड नेहरु अवॉर्ड दिया गया था। 1986 में भीष्म साहनी (Bhisham Sahni) को पद्मभूषण अलंकरण से भी विभूषित किया गया।

बड़े भाई बलराज साहनी का रहा बड़ा असर

वैसे भीष्म साहनी (Bhisham Sahni) के मन-मस्तिष्क में ‘तमस’ के लेखन बीज पड़वाने में उनके बड़े भाई बलराज साहनी का भी योगदान था। एक बार जब भिवंडी में दंगे हुए तो भीष्म साहनी अपने बड़े भाई के साथ यहां दौरे पर गए थे। यहां जब उन्होंने उजड़े मकानों, तबाही और बर्बादी का मंजर देखा तो उन्हें 1947 के दंगाग्रस्त रावलपिंडी के दृश्य याद आ गए। भीष्म साहनी (Bhisham Sahni) फिर जब दिल्ली लौटे तो उन्होंने इन्हीं घटनाओं को आधार बनाकर तमस लिखना शुरू किया था। ‘तमस’ सिर्फ दंगे और कत्लेआम की कहानी नहीं कहता। वह उस सांप्रदायिकता का रेशा-रेशा भी पकड़ता है जिसके नतीजे में ये घटनाएं होने लगती हैं।

भीष्म साहनी (Bhisham Sahni) का 11 जुलाई 2003 को दिल्ली में निधन हो गया और उन्होंने इस दुनिया को अलविदा कह दिया।



पद्म श्री और पद्म भूषण से सम्मानित थे अभिनेता गिरीश कर्नाड, जानें उनके सफर की कहानी

(आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम पर फ़ॉलो और यूट्यूब पर सब्सक्राइब भी कर सकते हैं.)