ज्योतिबा फुले की आज जयंती, भारतीय समाज में फैली अनेक कुरूतियों के थे विरोधी

समाज की कुरीतियों के खिलाफ आवाज़ उठाने वाले ज्योतिबा फूले समाज सुधारक के साथ- साथ एक भारतीय विचारक, लेखक, दार्शनिक तथा क्रान्तिकारी कार्यकर्ता थे। ज्योतिबा फुले का पूरा नाम ज्योतिराव गोविंदराव फुले था। उन्हें ‘महात्मा फुले’ के नाम से भी जाना जाता है।

महाराष्ट्र के पुणे में 11 अप्रैल 1827 को जन्मे ज्योतिबा फुले ने भारतीय समाज में फैली अनेक कुरूतियों जैसे छुआछूत,  नारी-शिक्षा, विधवा– विवाह और किसानो के हित के लिए क़ाफी संघर्ष किये।


पुणे में माली का काम करने के कारण इनका नाम फुले पड़ा। भेदभाव के कारण ज्योतिबा फुले ने अपनी स्कूली शिक्षा छोड़ घर पर शिक्षा प्राप्त की और 21 वर्ष की उम्र में इन्होने अंग्रेजी से सातवीं कक्षा की पढ़ाई पूरी की। ज्योतिबा फुले का विवाह 1840 में सावित्री बाई फुले से हुआ। आगे चल दोनों ने जाती के आधार पर भेदभाव हटाने व स्त्रियों के कल्याण के लिए अहम् काम किये। 28 नवंबर, 1890 को 63 साल की उम्र में उनका निधन हो गया।

ज्योतिबा फुले ने  अपने जीवन काल में समाज की कुरीतियों को समझ, उनके विरूद्ध आवाज़ उठाने के लिए महत्वपूर्ण संघर्ष किये। स्त्रियों की दशा सुधारने और उनकी शिक्षा के लिए ज्योतिबा ने 1848 में एक स्कूल खोला जो की देश का पहला ऐसा स्कूल था, जिसमे लड़कियों को शिक्षा दी जा रही थी। लड़कियों को पढ़ने के लिए  उन्होंने पत्नी सावित्री बाई फुले को इस योग्य बनाया। अड़चनों के बावजूद उन्होंने अपनी पत्नी के साथ मिल अन्य स्कूल खोले।

दलितों और निर्बल वर्ग को न्याय दिलाने के लिए ज्योतिबा ने 1873 में ‘सत्यशोधक समाज’ की स्थापना की।  उनकी समाजसेवा देखकर 1888 में मुंबई की एक विशाल सभा में उन्हें ‘महात्मा’ की उपाधि दी गई।


समाज कल्याण के लिए ज्योतिबा ने ब्राह्मण-पुरोहित के बिना ही विवाह-संस्कार आरंभ कराया और इसे मुंबई हाईकोर्ट से भी मान्यता भी मिली। वे बाल-विवाह विरोधी और विधवा-विवाह के समर्थक थे। महात्मा ज्योतिबा व उनके संगठन के संघर्ष के कारण सरकार ने ‘ऐग्रिकल्चर ऐक्ट’ पास किया था। उन्होंने ही ‘दलित’ शब्द का पहली बार प्रयोग किया था।

ज्योतिबा फुले ने कईं किताबें भी लिखी जिनमें तृतीय रत्न, छत्रपति शिवाजी, राजा भोसला का पखड़ा, ब्राह्मणों का चातुर्य, किसान का कोड़ा, अछूतों की कैफियत आदि शामिल हैं।

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