बसपा के संस्थापक कांशीराम: दलितों के हक की लड़ाई लड़ने के लिए सरकारी नौकरी को लात मार दी

बसपा के संस्थापक कांशीराम: सरकारी नौकरी छोड़ चुनी दलितों के हक की लड़ाई

भारत में दलित राजनीति को एक नए मुकाम पर ले जाने वाले नेता कांशीराम (Kanshi Ram) की आज जन्मतिथि है। फक्क्ड़ और अक्खड़ व्यक्तित्व वाले कांशीराम का जन्म पंजाब के रोपड़ जिले के पिरथीपुर बंगा गांव में हुआ था। दलित समाज के हक की लड़ाई लड़ने के लिए उन्होंने कई संगठन बनाये। देश के कोने-कोने में घूमकर लोगों को एकजुट किया और पहले डीएस-4, फिर बामसेफ और 1984 में दलित, ओबीसी और अल्पसंख्यक समाज के वैचारिक नेताओं को जोड़कर बहुजन समाज पार्टी(BSP) का गठन किया।

बसपा के संस्थापक कांशीराम: दलितों के हक की लड़ाई लड़ने के लिए सरकारी नौकरी को लात मार दी


मायावती(Mayawati) को राजनीति में लाने और मुख्यमंत्री की कुर्सी तक पहुँचाने का श्रेय भी कांशीराम को जाता है। बहुजन समाज के लोगों ने उन्हें मान्यवर और साहिब जैसी उपाधियों से नवाज़ा।

पढ़िए कांशीराम से जुड़े कुछ महत्वपूर्ण पहलू…

1. बीएससी की डिग्री हासिल करने के बाद कांशीराम ने हाई एनर्जी मैटिरियल्स रिसर्च लैबोरेटरी ज्वाइन किया और डिफेंस रिसर्च एंड डेवलपमेंट ऑर्गनाइजेशन (डीआरडीओ) का हिस्सा बन गए।

2. डीआरडीओ से जुड़ने के कुछ समय बाद ही कांशीराम ऑल इंडिया फेडरेशन ऑफ शेड्यूल्ड कास्ट/ट्राइब्स बैकवर्ड क्लास एंड माइनॉरिटी एंप्लाइज वेलफेयर एसोसिएशन के आंदोलन से जुड़े। यह समूह बाबा साहब बीआर अंबेडकर के जन्मदिन पर छुट्टी घोषित करने की मांग कर रहा था।


बसपा के संस्थापक कांशीराम: दलितों के हक की लड़ाई लड़ने के लिए सरकारी नौकरी को लात मार दी

3. 1965 में ही कांशीराम ने दलित समुदायों के लिए लड़ाई शुरू की थी। इसके बाद उन्होंने भारत की जाति व्यवस्था के बारे में पढ़ना शुरू किया और बाबा साहब अंबेडकर और ज्योतिबा फुले से प्रभावित हुए।

4. 1971 में लगभग 6 साल बाद कांशीराम ने नौकरी छोड़ दी। इसके बाद उन्होंने अपने कुछ साथियों के साथ मिलकर शेड्यूल कास्ट, शेड्यूल ट्राइब्स, ओबीसी एंड माइनॉरिटी वेलफेयर एसोसिएशन बनाया। इसके जरिए पिछड़ों के साथ होने वाले दुर्व्यवहार को रोकना और लोगों में जाति व्यवस्था के प्रति जागरुकता फैलाने जैसे उद्देश्य पूरे किए।

बसपा के संस्थापक कांशीराम: दलितों के हक की लड़ाई लड़ने के लिए सरकारी नौकरी को लात मार दी

5. 1973 में कांशीराम ने फिर अपने साथियों के साथ मिलकर बैकवर्ड एंड माइनॉरिटी कम्युनिटीज एंप्लाइज फेडरेशन (BAMCEF) की स्थापना की। इसका पहला दफ्तर 1976 में दिल्ली में खोला गया। इस फेडरेशन का काम बीआर अंबेडकर और उनके विचारों को लोगों तक पहुंचाना था। इसके बाद कांशीराम ने अपनी एक अलग पहचान बनानी शुरू की और लोगों को जाति व्यवस्था की असलियत से रू-ब-रू करवाना शुरू किया।

6.1981 में कांशीराम ने ‘दलित शोषित समाज संघर्ष समिति’ की शुरुआत की। यह समिति BAMCEF के साथ ही काम करती रही। इसका काम उन कार्यकर्ताओं के का बचाव करना था जो जाति व्यवस्था के प्रति लोगों में जागरुकता फैला रहे थे। 1986 में उन्होंने खुद के कार्यकर्ता से राजनेता में बनने की घोषणा की और वहीं से उनका राजनीतिक करियर शुरू हो गया।

बसपा के संस्थापक कांशीराम: दलितों के हक की लड़ाई लड़ने के लिए सरकारी नौकरी को लात मार दी

7. कांशीराम को सबसे बड़ा राजनीतिक मास्टर स्ट्रोक था 1993 में उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के लिए मुलायम सिंह यादव की समाजवादी पार्टी के साथ चुनावी गठबंधन। इस गठजोड़ के ज़रिए वो भारतीय जनता पार्टी को उत्तरप्रदेश में उस वक्त चुनाव में हरा पाए, जबकि कोई कल्पना भी नहीं करता था कि भारतीय जनता पार्टी चुनाव में हारेगी, ख़ास तौर से बाबरी मस्जिद टूटने के बाद।


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