Hindi Diwas 2020: वे आधुनिक कवि जिन्होंने हिन्दी साहित्य की दशा और दिशा दोनों बदल दी

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Hindi Diwas 2020: हिंदी दिवस हर साल 14 सितंबर को मनाया जाता है। भारत की संविधान सभा द्वारा नवगठित राष्ट्र की आधिकारिक भाषा के रूप में हिंदी भाषा को 14 सितंबर 1949 को अपनाया गया था। यह 26 जनवरी 1950 को भारतीय संविधान का एक अभिन्न हिस्सा बन गया। साल 1953 में हिंदी दिवस पहली बार मनाया गया था। बीहर राजेंद्र सिम्हा, हजारी प्रसाद द्विवेदी, काका कालेलकर, मैथिली शरण गुप्त और सेठ गोविंददास जैसे लोगों द्वारा हिन्दी को अधिकारिक भाषा बनाने की कोशिश की जा चुकी है।

आम दिनों में स्कूलों और कॉलेजों में विभिन्न कार्यक्रमों और वर्कशॉप का आयोजन करके हिन्दी दिवस मनाया जाता है लेकिन इस कोरोना (Corona) महामारी में यह संभव नहीं हो सकेगा। भारत में 258 मिलियन लोगों ने 2001 की भारतीय जनगणना के अनुसार हिंदी को अपनी मूल भाषा माना था।


हिन्दी दिवस पर आपको कुछ कालजयी हिन्दी कवियों और उनकी रचनाओं से रूबरु करवाएंगे-

प्रेमचंद (Premchand) (जुलाई 1880 – 8 अक्टूबर 1936)

प्रेमचंद का जन्म वाराणसी के पास एक गांव में हुआ था उनका असली नाम धनपत राय श्रीवास्तव था। हिन्दी साहित्य के क्षेत्र में प्रेमचंद का खासा योगदान है। प्रेमचंद को उनके पुत्र और प्रसिद्ध साहित्यकार अमृतराय ने कलम का सिपाही नाम दिया था। प्रसिद्ध बंगाली उपन्यासकार शरतचंद्र चट्टोपाध्याय ने भी उन्हें उपन्यास सम्राट की उपाधि दी थी। प्रेमचंद के प्रसिद्ध होने का एक कारण यह भी था कि उनकी कहानियां बेहद जमीनी होती थी। कहानियां हमारे आस पास के जीवन से ही प्रेरित होती थीं। ‘सेवासदन’ (1918), ‘प्रेमाश्रम’ (1921), ‘रंगभूमि’ (1925), ‘कायाकल्‍प’ (1926), ‘निर्मला’ (1927), ‘गबन’ (1931), ‘कर्मभूमि’ (1932), ‘गोदान’ (1936) जैसे प्रेमचंद के कुछ उपन्यान ने हिन्दी साहित्य की दिशा बदल दी। इसके अलाव प्रेमचंद ने कहानी, नाटक, समीक्षा, लेख, सम्पादकीय, संस्मरण आदि अनेक विधाओं में अपना योगदान दिया है।


प्रेमचंद की लिखी ‘कहानी’ कफन के कुछ अंश

जिस समाज में रात-दिन मेहनत करने वालों की हालत उनकी हालत से कुछ बहुत अच्छी न थी, और किसानों के मुकाबले में वे लोग, जो किसानों की दुर्बलताओं से लाभ उठाना जानते थे, कहीं ज्यादा सम्पन्न थे, वहाँ इस तरह की मनोवृत्ति का पैदा हो जाना कोई अचरज की बात न थी।

हम तो कहेंगे, घीसू किसानों से कहीं ज्यादा विचारवान् था और किसानों के विचार-शून्य समूह में शामिल होने के बदले बैठकबाजों की कुत्सित मण्डली में जा मिला था। हाँ, उसमें यह शक्ति न थी, कि बैठकबाजों के नियम और नीति का पालन करता। इसलिए जहाँ उसकी मण्डली के और लोग गाँव के सरगना और मुखिया बने हुए थे, उस पर सारा गाँव उँगली उठाता था।

फिर भी उसे यह तसकीन तो थी ही कि अगर वह फटेहाल है तो कम-से-कम उसे किसानों की-सी जी-तोड़ मेहनत तो नहीं करनी पड़ती, और उसकी सरलता और निरीहता से दूसरे लोग बेजा फायदा तो नहीं उठाते! दोनों आलू निकाल-निकालकर जलते-जलते खाने लगे।

कल से कुछ नहीं खाया था। इतना सब्र न था कि ठण्डा हो जाने दें। कई बार दोनों की जबानें जल गयीं। छिल जाने पर आलू का बाहरी हिस्सा जबान, हलक और तालू को जला देता था और उस अंगारे को मुँह में रखने से ज्यादा खैरियत इसी में थी कि वह अन्दर पहुँच जाए। वहाँ उसे ठण्डा करने के लिए काफी सामान थे। इसलिए दोनों जल्द-जल्द निगल जाते। हालाँकि इस कोशिश में उनकी आँखों से आँसू निकल आते।

 

हरिवंश राय बच्चन (27 नवम्बर 1907 – 18 जनवरी 2003)

हरिवंश राच बच्चन प्रसिद्ध कवि में से एक हैं। बॉलीवुड के महानायक अमिताभ इनके पुत्र हैं। हरिवंश राय बच्चन कवि के अलावा भारत सरकार के विदेश मंत्रालय में हिन्दी विशेषज्ञ भी थे। इनकी कविता मधुशाला बेहद प्रसिद्ध हुई थी।

मधुशाला के कुछ अंश

मधुर भावनाओं की सुमधुर नित्य बनाता हूँ हाला,
भरता हूँ इस मधु से अपने अंतर का प्यासा प्याला,
उठा कल्पना के हाथों से स्वयं उसे पी जाता हूँ,
अपने ही में हूँ मैं साकी, पीनेवाला, मधुशाला।

मदिरालय जाने को घर से चलता है पीनेवला,
‘किस पथ से जाऊँ?’ असमंजस में है वह भोलाभाला,
अलग-अलग पथ बतलाते सब पर मैं यह बतलाता हूँ –
‘राह पकड़ तू एक चला चल, पा जाएगा मधुशाला।

चलने ही चलने में कितना जीवन, हाय, बिता डाला!
‘दूर अभी है’, पर, कहता है हर पथ बतलानेवाला,
हिम्मत है न बढूँ आगे को साहस है न फिरुँ पीछे,
किंकर्तव्यविमूढ़ मुझे कर दूर खड़ी है मधुशाला।

 

रामधारी सिंह ‘दिनकर’ ‘ (23 सितंबर 1908 – 24 अप्रैल 1974)

दिनकर आधुनिक काल के वीर रस के कवि थे। दिनकर को ‘राष्ट्रकवि’ भी कहा जाता था। वह राज्यसभा सांसद भी रह चुके हैं। दिनकर कभी आलोचना करने से कतराते नहीं थे। राजनीति में भी उनके रचनाओं ने खूब नाम कमाया। एक बार उन्होंने भरी संसद में जवाहर लाल नेहरु पर निशाना साधते हुए एक कविता पढ़ा था। दिनकर की रचना रश्मिरथी बेहद मशहूर हई थी।

कृष्ण की चेतावनील के कुछ अंश

दो न्याय अगर तो आधा दो,
पर, इसमें भी यदि बाधा हो,
तो दे दो केवल पाँच ग्राम,
रक्खो अपनी धरती तमाम।
हम वहीं खुशी से खायेंगे,
परिजन पर असि न उठायेंगे!

दुर्योधन वह भी दे ना सका,
आशीष समाज की ले न सका,
उलटे, हरि को बाँधने चला,
जो था असाध्य, साधने चला।
जब नाश मनुज पर छाता है,
पहले विवेक मर जाता है।

महादेवी वर्मा

महादेवी वर्मा हिन्दी साहित्य के छयावाद युग के चार स्तम्भों में से एक मानी जाती हैं। इन्हें लोग आधुनिक मीरा भी कहते हैं। इन्हें ज्ञानपीठ पुरस्कार से भी सम्मानित किया जा चुका है। उनके द्वारा रचित दीपशिखा खासा प्रसिद्ध हुई थी।

दिपशिखा के कुछ अंश

पंथ होने दो अपरिचित प्राण रहने दो अकेला!
घेर ले छाया अमा बन,
आज कज्जल-अश्रुओं में रिमझिमा ले यह घिरा घन,
और होंगे नयन सूखे,
तिल बुझे औ’ पलक रूखे,
आर्द्र चितवन में यहाँ
शत विद्युतों में दीप खेला

अन्य होंगे चरण हारे,
और हैं जो लौटते, दे शूल को संकल्प सारे,
दुखव्रती निर्माण उन्मद,
यह अमरता नापते पद,
बाँध देंगे अंक-संसृति
से तिमिर में स्वर्ण बेला!

सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’

निराला छायावाद के चार स्तभों में से एक माने जाते थे। निराला बेहद फक्कड़ मिजाजी थे। सादा जीवन व्यतित करने वालों में से थे निराला। एक बार निराला ने विचारों के मतभेद को लेकर महात्मा गांधी से वाद विवाद भी कर लिया था। इनका जन्म बंगाल में हुआ था।

निराला द्वारा रचित कविका के कुछ अंश

बाँधो न नाव इस ठाँव, बंधु!
पूछेगा सारा गाँव, बंधु!

यह घाट वही जिस पर हँसकर,
वह कभी नहाती थी धँसकर,
आँखें रह जाती थीं फँसकर,
कँपते थे दोनों पाँव बंधु!

वह हँसी बहुत कुछ कहती थी,
फिर भी अपने में रहती थी,
सबकी सुनती थी, सहती थी,
देती थी सबके दाँव, बंधु!

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