इस देश में 16 साल तक बच्चे नहीं देते कोई एग्जाम, माना जाता है दुनिया का बेहतरीन एजुकेशन सिस्टम 

आजकल देश भर में बोर्ड रिजल्ट्स का दौर जारी है। ऐसे में अक्सर छात्रों के बीच नंबरों की होड़ लगी रहती है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि दुनिया के बेहतरीन  एजुकेशन सिस्टम  में 16 साल की उम्र तक कोई एक्जाम नहीं देना होता। आप हैरान ना हों और  गूगल पर दुनिया के बेहतरीन स्कूलों की लिस्ट सर्च करें,  इस मामले में फिनलैंड आपको सबसे ऊपर दिखाई देगा। यहां का एजुकेशन सिस्टम अमेरिका, ब्रिटेन या अन्य देशों की तुलना में एकदम अलग है। फिनलैंड आज से नहीं बल्कि दशकों से इस मामले में बहुत आगे रहा है। फिनलैंड के एजुकेशन सिस्टम स्टूडेंट्स को एक अलग तरह की स्वतंत्रता तो देता ही है, साथ ही क्रिएटिविटी के लिए भी लगातार उत्साहित करता है। उसका फंडा ऊंचे नंबरों के लिए कम्पेटेटिव दौड़ का है ही नहीं। ये सिस्टम उन तमाम देशों को सीख देता है, जो आज भी नंबर रेस, एग्जाम और कंपटीशन में अपने स्टूडेंट को फंसाए रखकर दबाव और तनाव को जगह देते रहते हैं।

सात साल की उम्र में शुरू होती है फॉर्मल एजुकेशन

हम अक्सर देखते हैं कि बच्चा जब छोटा होता है तभी से मां-बाप उसकी पढ़ाई को लेकर चिंता में डूबे रहते हैं लेकिन फिनलैंड का हिसाब अलग ही है। यहां जब बच्चा सात साल का हो जाता है तब उसकी फॉर्मल स्कूलिंग शुरू होती है। जब तक बच्चा 16 का नहीं हो जाता तब वो किसी भी तरह के एग्जाम में नहीं बैठता। सात साल से पहले हर बच्चे को शुरुआती चाइल्डहुड एजुकेशन दी जाती है और उनकी केयर होती है। इसमें हर बच्चे पर खास ध्यान दिया जाता है। इस शुरुआती शिक्षा का औपचारिक शिक्षा से कोई लेना देना नहीं होता बल्कि उसकी हेल्थ और अच्छा इंसान होने पर जोर होता है।


होमवर्क नहीं मिलता

फिनलैंड के सिस्टम में कोशिश की जाती है कि हर बच्चे की ऊर्जा को पहचाना जाए। यहां के बच्चे शायद ही कभी घर में होमवर्क करते हैं। यहां के शिक्षकों को पूरी छूट होती है कि वो अपने तरीकों से बच्चों को इस तरह पढ़ा सकते हैं जिससे उनकी पढाई आसान हो और एक्सपेरिमेंट का भी विकल्प मिले। ये ऐसा भी होता है कि बच्चा खुशी खुशी पढने में दिलचस्पी ले।

फिनलैंड में बच्चे 16 साल की उम्र तक किसी भी तरह के नेशनल टेस्ट में नहीं बैठते। उनका मूल्यांकन कई आधार पर करते हैं। कुल मिलाकर बेसिक एजुकेशन पॉलिसी ऐसी है जहां टीचर बच्चे में ये क्षमता पैदा करे कि वो अपना मूल्यांकन खुद ब खुद कर सकें। इससे बच्चे अपनी ग्रोथ और लर्निंग प्रोसेस को लेकर खुद सतर्क रहते हैं।


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