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राजनीति

जहजवा ही चुराकर खाने लग गए, वो भी लड़ाकू… गजबे बा : लालू

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जहजवा ही चुराकर खाने लगे..गजबे बा : लालू

राष्ट्रीय जनता दल (राजद) के अध्यक्ष और चारा घोटाला के कई मामलों में सजाकाट रहे लालू प्रसाद सोमवार को राफेल सौदे में कथित घपले को लेकर केंद्र सरकार पर निशाना साधा। लालू ने ट्वीट कर अपने अंदाज में लिखा, “जहजवा ही चुराकर खाने लग गए, वो भी लड़ाकू। गजबे बा।” फ्रांस के पूर्व राष्ट्रपति फ्रांस्वा ओलांद का साक्षात्कार दुनिया के कई टीवी चैनलों पर प्रसारित होने के बाद राफेल सौदे को लेकर सरकार और विपक्ष दोनों की तरफ से प्रतिदिन आरोप-प्रत्यारोप जारी है।

भ्रष्टाचार के मामले में सजायाफ्ता लालू भी अब राफेल के मुद्दे पर सरकार को घेरने वालों में शामिल हो गए हैं। लालू ने इससे पहले भी ट्वीट कर राफेल मामले को लेकर सरकार पर निशाना साधा था।

हे भगवान! यह क्या हो रहा : कुशवाहा

लालू ने शुक्रवार को अपने ट्वीट में लिखा था, “मित्रों, राफेल सौदे के घालमेल और तालमेल की सही जानकारी 125 करोड़ देशवासियों को मिलनी चाहिए कि नहीं? अगर पूंजीपति मिलनसार प्रधानमंत्री गुनाहगार व भागीदार नहीं है और ईमानदार चौकीदार है तो सच बताने में डर काहे का?”

सजा काट रहे लालू अपनी बीमारी के इलाज के क्रम में इन दिनों रांची के एक अस्पताल में भर्ती हैं।

–आईएएनएस

भारत

बाल ठाकरे : जानें कार्टूनिस्ट से राजनेता तक का सफर

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बाल ठाकरे: जानें कार्टूनिस्ट से राजनेता तक का सफर

बाल ठाकरे, एक कार्टूनिस्ट से राजनेता बने और फिर पीछे मुड़कर नहीं देखा। राजनेता ऐसा जिस पर कई बार कानून तोड़ने के आरोप लगे। उनका राजनीतिक सफ़र भी बड़ा अनोखा था। वो एक पेशेवर कार्टूनिस्ट थे और शहर के एक अखबार फ़्री प्रेस जर्नल में काम करते थे। बाद में उन्होंने नौकरी छोड़ दी। बाबरी विध्वंस से लेकर उत्तर भारतीयों पर हमलों के आरोप के बावजूद ठाकरे महाराष्ट्र की सत्ता के केंद्र बिंदू बने रहे।

ठाकरे का जन्‍म उस समय के बोम्‍बे रेजिडेंसी के पुणे में 23 जनवरी 1926 को एक मराठी परिवार में हुआ था। उनका असल नाम बाल केशव ठाकरे है। बाला साहब ठाकरे और हिदू हृदय सम्राट के नाम से भी उन्‍हें जाना जाता है। 9 भाई-बहनों में बाल ठाकरे सबसे बड़े थे।

बाल ठाकरे ने 1966 में शिवसेना नामक अपनी राजनीतिक पार्टी का भी गठन किया और मराठी मानुस का मुद्दा उठाया। उनकी पार्टी की महाराष्‍ट्र में अच्‍छी पकड़ थी और बाहरी लोगों के विरोध के कारण उन्‍हें ज्‍यादा पहचान मिली। पहले दक्षिण भारतीयों पर और बाद में उत्तर भारतीयों के खिलाफ मराठीयों को खड़ा करके उन्होंने अपनी पैठ बनाई।

बाल ठाकरे अच्छे कार्टूनिस्ट थे, जिन्होंने महाराष्ट्र में अपनी पहचान खुद बनाई। उन्होंने अपने करियर की शुरुआत मुंबई के एक अंग्रेजी दैनिक ‘द फ्री प्रेस जर्नल’ के साथ बातौर कार्टूनिस्‍ट की। साल 1960 में बाल ठाकरे ने कार्टूनिस्‍ट की नौकरी छोड़ दी। इसके बाद अपना राजनीतिक साप्‍ताहिक अखबार मार्मिक निकाला। बाल ठाकरे के कार्टून ‘टाइम्‍स ऑफ इंडिया’ में हर रविवार को छपा करते थे।

मुंबई को अपना गढ़ बनाकर काम करने वाले बाल ठाकरे लगभग 46 साल तक सार्वजनिक जीवन में रहे, लेकिन शिवसेना प्रमुख बाल ठाकरे ने कभी न तो कोई चुनाव लड़ा और न ही कोई राजनीतिक पद स्वीकार किया। इसके बावजूद वह महाराष्ट्र की राजनीति में अहम भूमिका निभाते रहे ।

17 नवंबर 2012 का वो दिन था जब मुंबई समेत पूरे देश में शोक की लहर दौड़ गई। 86 साल के ठाकरे का निधन मुंबई में उनके निवास मातोश्री में दोपहर करीब 03:30 बजे हुआ था।

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नेताजी सुभाष चंद्र बोस का जन्मदिन: PM मोदी ने किया बोस से जुड़े संग्रहालय का उद्घाटन

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तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हे आजादी दूंगा’ का नारा देने वाले नेताजी सुभाष चंद्र बोस का आज जन्मदिन है। इस मौके पर दिल्ली में नेताजी से जुड़े संग्रहालयों का उद्घाटन हो रहा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आज बुधवार को दिल्ली के लाल किले में तैयार किए गए चार संग्रहालयों का उद्घाटन किया। इसकी शुरुआत खास तौर से नेताजी सुभाष चंद्र बोस के जीवन पर आधारित संग्रहालय के उद्घाटन के साथ हुई। प्रधानमंत्री ने सुबह लाल किले में यह संग्रहालय सुभाष चंद्र बोस की जयंती पर राष्ट्र को समर्पित किया। इस संग्रहालय में बोस की जिंदगी से जुड़ी कईं महत्वपूर्ण चीजें रखी गईं हैं।इसे 26 जनवरी के बाद आम लोगों के लिए खोल दिया जाएगा।

यहां नेताजी सुभाष चंद्र बोस और आजाद हिंद फौज पर संग्रहालय में सुभाष चंद्र बोस और INA से जुड़ी विभिन्न वस्तुओं को प्रदर्शित किया गया है। वहीं नेताजी द्वारा इस्तेमाल की गई लकड़ी की कुर्सी और तलवार के अलावा INA से संबंधित पदक, बैज, वर्दी और अन्य वस्तुएं भी शामिल हैं।

इसके बाद प्रधानमंत्री ने जलियांवाला बाग पर आधारित याद-ए-जलियां संग्रहालय का शुभारंभ कर इसका अवलोकन किया। यहां 2 और संग्रहालय बनाए गए हैं जिनमें 1857 में हुई स्वतंत्रता की पहली लड़ाई से संबधित संग्रहालय, आजादी के दीवाने शामिल हैं। 26 जनवरी के बाद इन संग्रहालयों को आम लोगों के लिए खोल दिया जाएगा।

मोदी ने बदला था अंडमान के तीन द्वीपों के नाम, नेताजी के नाम पर रखा
मालुम हो कि आजाद हिंद फौज ने अंडमान निकोबार द्वीप समूह में 75 साल पहले तिरंगा फहराया था। इसी की 75वीं वर्षगांठ के मौके पर कुछ दिन पहले ही PM नरेंद्र मोदी अंडमान के दौरे पर गए थे। तब उन्होंने 3 द्वीपों का नाम सुभाष चंद्र बोस के नाम पर रखने का ऐलान किया था। अंडमान के हैवलॉक द्वीप का नाम स्वराज द्वीप, नील द्वीप का नाम शहीद द्वीप और रॉस द्वीप को नेताजी सुभाष चंद्र द्वीप के नाम से जाना जाएगा।

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भारत

‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ अभियान का 56 फीसदी फंड सिर्फ प्रचार पर खर्च

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'बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ' अभियान का 56 फीसदी फंड सिर्फ प्रचार पर खर्च beti bachao beti padhao major chunk of funds spent on publicity

22 जनवरी, 2015 को भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दो लक्ष्यों को ध्यान में रखकर ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ स्कीम की शुरुआत की। इसका पहला उद्देश्य देश में घटते लिंग अनुपात को बढ़ाना था और दूसरा लड़कियों को लेकर पिछड़ी सोच में बदलाव करना था। सरकार की इस योजना को तीन मंत्रालयों महिला और बाल विकास, मानव संसाधन विकास, और स्वास्थ्य और परिवार कल्याण के माध्यम से देशभर में लागू करने का फैसला किया गया। इस स्कीम के लागू होने के चार साल बाद केंद्र सरकार ने जो आंकड़े जारी किए हैं, उससे पता चलता है कि इस स्कीम का मुख्य उद्देश्य सिर्फ और सिर्फ पब्लिसिटी था।

‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ स्कीम पर वित्तीय वर्ष 2014-15 से 2018-19 तक आवंटित हुए कुल फंड का 56 फीसदी से ज्यादा भाग ‘मीडिया संबंधी गतिविधियों’ (यानी की प्रचार-प्रसार) पर खर्च किया गया। इसके विपरीत, 25 फीसदी से कम धनराशि जिलों और राज्यों को क्रमवार बांटी गई, जबकि 19 फीसदी से ज्यादा धनराशि जारी ही नहीं की गई।

ये हैरान करने वाले आंकड़े इसी साल 4 जनवरी को लोकसभा में केंद्रीय महिला एवं बाल विकास राज्य मंत्री डॉ. वीरेंद्र कुमार ने अपने जवाब में दिए हैं। पांच सांसदों कपिल पाटिल और शिवकुमार उदासी (बीजेपी के वर्तमान सांसद है ), कांग्रेस की सुष्मिता देव, तेलंगाना राष्ट्र समिति के गुथा सुकेंदर रेड्डी और शिवसेना के संजय जाधव ने सदन में ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ को लेकर सवाल रखा था।

अब तक नरेंद्र मोदी सरकार इस स्कीम पर कुल 644 करोड़ रुपये आवंटित कर चुकी है। इनमें से केवल 159 करोड़ रुपये ही जिलों और राज्यों को भेजे गए हैं। बाकी का शेष भाग ज्यादातर या तो प्रमोशन में खर्च हुआ है, या फिर विविध खर्चों में।

“बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ” योजना सफल या विफल?

साल 2015 में “बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ” स्कीम के पहले चरण में, सरकार ने अपेक्षाकृत कम लिंगानुपात वाले कुल 100 जिलों पर ध्यान केंद्रित किया। उसके बाद दूसरे चरण में, सरकार ने 61 और जिलों को इस योजना से जोड़ा। इन 161 जिलों में बाल लिंगानुपात के आधार पर योजना आंशिक तौर पर सफल रही है। 161 में से 53 जिलों में, 2015 से बाल लिंग अनुपात में गिरावट आई है। इनमें से पहले चरण के 100 में से 32 जिले और दूसरे चरण के 61 में से 21 जिले शामिल हैं। हालांकि, बाकी जिलों में बाल लिंगानुपात में वृद्धि हुई है।

कई विभागीय विशेषज्ञों का कहना है कि स्कीम की सीमित सफलता काफी हद तक इस तथ्य की वजह से है कि सरकार धन को प्रभावी रूप से जारी नहीं कर रही है और यह शिक्षा और स्वास्थ्य क्षेत्रों में ठोस हस्तक्षेप के बजाय प्रचार पर बहुत ज्यादा खर्च कर रही है। सरकार द्वारा आवंटित 644 करोड़ में से महज 159 करोड़ रूपए ही जिलों और राज्यों को भेजे गए हैं।


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