जानें कौन हैं ईश्वरचंद्र विद्यासागर, पढ़े उनके जीवन से जुड़ी 10 बातें

ईश्वरचंद्र विद्यासागर एक महान समाज सुधारक, शिक्षा शास्त्री और स्वाधीनता संग्राम के सेनानी थे। उन्हें गरीबों और दलितों का संरक्षक माना जाता था।  उनका जन्म 26 सितंबर, 1820 को कोलकाता में हुआ था। उन्होंने समाज में बदलाव लाने के लिए अनेकों काम किए। भारत में शिक्षा और महिलाओं की स्थिति को बदलने में उनका योगदान उल्लेखनीय है। ईश्वर चंद्र विद्यासागर ने बहुविवाह, बाल-विवाह का पुरजोर विरोध किया। भारत में विधवा पुनर्विवाह और महिलाओं की शिक्षा के लिए उन्होंने आवाज बुलंद की। उनके अथक प्रयासों के कारण 1856 में विधवा पुनर्विवाह अधिनियम पारित किया गया। जिससे विधवाओं का विवाह कानूनी हो गया।

विद्यासागर की मृत्यु के कुछ ही समय बाद, रवींद्रनाथ टैगोर ने उनके बारे में श्रद्धापूर्वक लिखा था: “एक आश्चर्य की बात है कि भगवान ने चालीस करोड़ बंगाली बनाने की प्रक्रिया में, एक आदमी कैसे पैदा कर दिया!”


जानें उनके जीवन से जुड़े 10 तथ्य

  • ईश्वरचंद्र विद्यासागर का जन्म 26 सितंबर 1820 को एक रूढ़िवादी परिवार में ईश्वर चंद्र बंद्योपाध्याय के रूप में हुआ था।
  • वह एक भारतीय बंगाली पॉलीमैथ और बंगाल पुनर्जागरण के प्रमुख व्यक्ति थे।
  • विद्यासागर एक दार्शनिक, अकादमिक शिक्षक, लेखक, अनुवादक, मुद्रक, प्रकाशक, उद्यमी, सुधारक और परोपकारी व्यक्ति थे।
  • ज्ञान के लिए उनकी खोज इतनी तीव्र थी कि वह एक स्ट्रीट लाइट के नीचे पढ़ते थे क्योंकि उनके लिए घर पर गैस लैंप का खर्च उठाना संभव नहीं था।
  • वर्ष 1839 में  विद्यासागर ने सफलतापूर्वक अपनी कानून की पढ़ाई पूरी की।
  • 1841 में महज  21 वर्ष की आयु में, ईश्वर चंद्र फोर्ट विलियम कॉलेज में संस्कृत विभाग के प्रमुख के रूप में शामिल हुए।
  • उन्होंने विधवा पुनर्विवाह का समर्थन किया और उनके संघर्षों के कारण 1856 में विधवा पुनर्विवाह अधिनियम पारित हुआ।
  • उन्होंने बंगाली वर्णमाला का पुनर्निर्माण किया। विद्यासागर  ने बारह स्वरों और चालीस स्वरों की वर्णमाला (वास्तव में अबुगीदा) में बंगाली टाइपोग्राफी को सुधारा।
  • उन्हें संस्कृत महाविद्यालय, कलकत्ता  से ‘विद्यासागर’ की उपाधि मिली, जिसका अर्थ है ज्ञान का सागर।
  • उन्होंने कई किताबें लिखीं जो अब बंगाली साहित्य का हिस्सा हैं।

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