Munshi Premchand Death Anniversary: जब मुंशी प्रेमचंद के पास पहनने तक के लिए नहीं थे कपड़े, जानें महान लेखक की कुछ प्रमुख बातें

पुण्यतिथि विशेष: जब मुंशी प्रेमचंद के पास पहनने तक के लिए नहीं थे कपड़े

Munshi Premchand Death Anniversary: मुंशी प्रेमचंद का नाम साहित्य के उन लेखकों में शुमार किया जाता है, जिन्होंने अपनी रचनाओं से समाज का आईना पेश किया। उनकी रचनाएं न सिर्फ उस समय की सच्चाई बयान करती थीं, बल्कि आज भी इन रचनाओं से समाज को आसानी से जोड़ा जा सकता है। आज इस महान लेखक की पुण्यतिथि है।

मुंशी प्रेमचंद (Munshi Premchand) का जन्म 31 जुलाई 1880 को हुआ था। उनका असली नाम मुंशी प्रेमचंद नहीं, बल्कि धनपत राय श्रीवास्तव था। उन्होंने महज 13 साल की उम्र में लिखना शुरू कर दिया था। वकील बनने की चाह रखने वाले प्रेमचंद को जिंदगी ने एक लेखक बना दिया। उनका जीवन खराब माली हालत और परिवार की परेशानियों के कारण संघर्षपूर्ण रहा, लेकिन इसके बावजूद वह यह महान लेखक बने। आइये जानते हैं मुंशी प्रेमचंद के जीवन के कुछ अनछुए पहलुओं के बारे में।


8 साल की उम्र में मां का निधन

प्रेमचंद जब महज 8 साल के थे, तभी उनकी मां आनंदी देवी का निधन हो गया था। इसके बाद उनके पिता ने दूसरी शादी कर ली। सौतेली मां का बर्ताव उनके साथ बहुत बुरा था। उन्हें प्यार की जगह हमेशा तिरस्कार और डांट ही मिली। घर की हालत और गरीबी के कारण हमेशा झगड़ा होता रहता था। इन्हीं सब के बीच उन्होंने अपना बचपन बिताया।

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जब पहनने तक के लिए नहीं थे कपड़े

प्रेमचंद के पिता ने सिर्फ 15 साल की उम्र में ही उनकी शादी करवा दी थी। शादी के एक साल बाद ही उनके पिता ने दुनिया को अलविदा कह दिया, जिसके बाद घर- परिवार की पूरी जिम्मेदारी उन पर आ गई। गरीबी का आलम कुछ ऐसा था कि उनके पास पहनने तक के लिए कपड़े नहीं थे। खर्च चलाने के लिए उन्हें घर के सामान के साथ अपनी किताबें और कोट बेचने पड़े थे।


उनका यह विवाह सफल नहीं रहा था और वह अपनी पत्नी से अलग हो गए थे।

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बाल विधवा से की दूसरी शादी

प्रेमचंद ने न सिर्फ अपनी कहानियों में बदलाव के बारे में लिखा, बल्कि अपने जीवन में किया भी। वह आर्य समाज से प्रभावित रहे और विधवा-विवाह का समर्थन किया। इसी के चलते उन्होंने बाल विधवा शिवरानी देवी दूसरी शादी की। इस शादी के बाद समाज के कई लोगों ने उनका बहिष्कार भी किया, लेकिन वह अपने फैसले पर अड़े रहे और पूरा जीवन उन्ही के साथ बिताया।

रचनाओं के जरिये समाज को दिखाया आईना

उन्होंने अपनी रचनाओं से समाज का यथार्त चित्रण किया उन्होंने समाज की सच्चाई को इस तरह पेश किया कि समाज का हर एक तबका इन कहानियों में खुद को ढूंढ लेता था।

हिंदी के साथ उर्दू पर भी उनकी अच्छी पकड़ थी उन्होंने कुल 15 उपन्यास, 300 से कुछ अधिक कहानियां, 3 नाटक, 10 अनुवाद, 7 बाल-पुस्तकें और हजारों पृष्ठ के लेख, सम्पादकीय, व्याख्यान, भूमिका, पत्र आदि की रचना की थी। लेकिन उपन्यास और कहानियों के लिए उन्हें सबसे ज्यादा पसंद किया गया। उनके जीवन के संघर्ष ने उनकी रचनाओं को एक नई दिशा दी।

अपनी रचनाओं से समाज को नई दिशा दिखाने वाले मुंशी प्रेमचंद (Munshi Premchand) ने 8 अक्टूबर 1936 को दुनिया को अलविदा कह दिया था।


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