Kuldip Nayar: पत्रकारिता के ‘भीष्‍म पितामह’ कुलदीप नैयर, जानें उनकी लिखी कुछ बेहद मशहूर किताबों के बारे में…

Kuldip Nayar: पत्रकारिता के 'भीष्‍म पितामह' कुलदीप नैयर, जानें उनकी लिखी कुछ बेहद मशहूर किताबों के बारे में...

Kuldip Nayar Birth Anniversary : आजादी के जमाने से शीर्ष पत्रकारिता में सक्रिय रहे कुलदीप नैयर (Kuldip Nayar) को पत्रकारिता का ‘भीष्म पितामह’ माना जाता है। कुलदीप नैयर (Kuldip Nayar) देश के बंटवारे से पहले सियालकोट (अब पाकिस्तान) में 14 अगस्त, 1923 को पैदा हुए। उनकी पढ़ाई लाहौर में हुई। वह वकील बनना चाहते थे, लेकिन अपनी वकालत जमा पाते, उससे पहले ही देश का बंटवारा हो गया। सियालकोट छोड़कर उनका परिवार भारत आ गया। यहां उन्होंने पत्रकारिता को चुना और कलम को अपना हथियार बनाया।

कुलदीप नैयर (Kuldip Nayar) ने कई नामचीन अखबारों में शीर्ष पदों पर काम किया। पत्रकारिता जगत में कई सालों तक सक्रिय रहने के साथ उन्होंने राजनेता, डिप्लोमेट के तौर पर भी काम किया। नैयर को 1996 में संयुक्त राष्ट्र के लिए भारत के प्रतिनिधिमंडल के सदस्य बनाया गया था। इससे पहले 1990 में उन्हें ग्रेट ब्रिटेन में उच्चायुक्त नियुक्त किया गया था, अगस्त 1997 में राज्यसभा में नामांकित किया गया था। लेकिन, पत्रकारिता के क्षेत्र में उन्होंने अविस्मरणीय कार्य किए। कुलदीप नैयर (Kuldip Nayar) उन पत्रकारों में से एक थे जिन्‍होंने सरकार के सही फैसलों पर उनकी सराहना करने और गलत फैसलों पर उनकी आलोचना करने से कभी नहीं चूके। उन्‍होंने भारतीय राजनीति को बेहद करीब से जाना भी और समझा भी।


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1975 में इंदिरा गांधी द्वारा लगाए गए आपातकाल का कुलदीप नैयर (Kuldip Nayar) ने मुखरता से विरोध किया था। इसके चलते उन्‍हें जेल तक जाना पड़ा था। एक बार उन्‍होंने लिखा था कि इंदिरा गांधी इस्‍तीफा देना चाहती थीं, लेकिन उनके सलाहकारों ने इंदिरा को ऐसा न करके देश में आपातकाल लगाने की सलाह दे डाली। इसके अलावा  इंदिरा गांधी के ऑपरेशन ब्‍लूस्‍टार के जरिये स्‍वर्ण मंदिर में मौजूद उग्रवादियों को बाहर खदेड़ने या मार गिराने के फैसले को भी उन्होंने जल्‍दबाजी में लिया गया फैसला बताया।

कुलदीप नैयर (Kuldip Nayar) की बात की जाए तो उन्‍होंने सिर्फ इंदिरा गांधी का ही नहीं बल्कि जवाहरलाल नेहरू और लाल बहादुर शास्‍त्री के दौर और उनकी सियासत बेहद करीब से देखा था। वह पंडित नेहरू की आलोचना करने से भी कभी पीछे नहीं रहे। अपनी एक किताब में उन्‍होंने नेहरु के बारे में लिखा था कि उन्‍होंने ऐसे समझौते किए थे जो उन्‍हें नहीं करने चाहिए थे। लेकिन फिर भी वे मेरे हीरो थे और मैं उनकी कमियों के लिए यह तर्क देता था कि देश को एक रखने के लिए उन्‍हें सभी तरह के हितों, प्रदेशों और धर्मों का ध्‍यान रखना पड़ता था।

राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद, जिन्होंने इंदिरा गांधी के कहने पर किए थे इमरजेंसी के दस्तावेज पर साइन

कुलदीप (Kuldip Nayar) आजीवन मानवाधिकार कार्यकर्ता के रूप में भी सक्रिय रहे। उन पर छद्म धर्मनिपेक्ष होने के साथ-साथ हिंदू विरोधी होने के भी आरोप समय-समय पर लगते रहते हैं। नैयर ने तो एक बार यहाँ तक कह डाला था कि तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी को कानून बनाना चाहिए, कि किसी राष्ट्रीय स्वयं सेवक को उच्च पद के लिए अयोग्य घोषित कर दिया जाए। पिछले साल 23 अगस्त को 95 वर्ष की उम्र में कुलदीप नैयर ने इस दुनिया को अलविदा कह दिया। मरणोपरांत उन्हें पद्म विभूषण से सम्मानित किया गया।


उन्होंने अपने जीवन में कई किताबें लिखीं, जिसमें उनकी आत्मकथा भी शामिल है। वहीं उन्होंने अपनी किताबों से राजनीति के कई राज भी खोले हैं। कुलदीप नैयर (Kuldip Nayar) की लिखी किताबों में उनकी आत्मकथा ‘बियांड द लाइंस’ काफी लोकप्रिय रही। बाद में इसका हिंदी अनुवाद भी ‘एक जिंदगी काफी नहीं’ नाम से पाठकों तक पहुंचा। उन्होंने इसके अतिरिक्त कई किताबें ‘बिटवीन द लाइंस’, ‘डिस्टेंट नेवर: ए टेल ऑफ द सब कान्टिनेंट’, ‘इंडिया आफ्टर नेहरू’, ‘वाल एट वाघा, इंडिया पाकिस्तान रिलेशनशिप’, ‘इंडिया हाउस’ आदि लिखी हैं। आइए जानते हैं उनकी कुछ प्रमुख किताबों के बारे में…

बियॉन्ड द लाइंस

यह कुलदीप नैयर (Kuldip Nayar) की आत्मकथा है। किताब में उन्होंने पाकिस्तान में अपने जन्म से लेकर भारत में पत्रकारिता और राजनीतिक उथल-पुथल की घटनाओं को बड़े ही रोचक तरीके से बयां किया है। इसमें उन्होंने अपने पत्रकारिता क्षेत्र से लेकर सासंद बनने तक के सफर और आपातकाल से जुड़ी कई बातें लिखी हैं।

विदआउट फियर: लाइफ एंड ट्रायल ऑफ भगत सिंह

यह किताब शहीद भगत सिंह के जीवन और उनके केस पर आधारित है। इसमें नैयर ने भगत सिंह के बारे में बताया, जिसमें उनकी मान्यताएं, उनका बौद्धिक झुकाव, उनके सपने और उनकी निराशा आदि का वर्णन किया है। लाहौर असेंबली केस और सौंडर्स हत्याकांड में भगत सिंह के ऊपर चल रहे मुकदमों का विस्तार से जिक्र है।

इंडिया हाउस

कुलदीप नैयर (Kuldip Nayar) ब्रिटेन में हाई कमिश्नर रहे थे और उसके बाद उन्होंने ये किताब लिखी इस किताब में उनके डिप्लोमेट रहने के दौरान जो अनुभव किया, उसके बारे में बताया है।

द जजमेंट: इनसाइड स्टोरी ऑफ द इमरजेंसी इन इंडिया

कुलदीप नैयर (Kuldip Nayar) की यह किताब आपातकाल पर लिखी प्रमुख किताबों में से एक है। उन्होंने अपनी इस किताब में 12 जून 1975, जिस दिन इलाहाबाद हाईकोर्ट ने इंदिरा गांधी को लेकर फैसला सुनाया था, से अपना वर्णन शुरू किया है।

इंडिया आफ्टर नेहरू

इस किताब में नैयर ने भारतीय राजनीति में आए उतार-चढ़ाव के बारे में लिखा है। इसमें मुख्यत: 1964 से 1975 के कालखंड तक की जानकारी दी गई है।

ऑन लीडर्स एंड आइकंस फ्रॉम जिन्ना टू मोदी

‘ऑन लीडर्स एंड आइकंस फ्रॉम जिन्ना टू मोदी’ कुलदीप नैयर (Kuldip Nayar) की लिखी अंतिम किताब है। नैयर ने अपनी इस किताब में गांधी, जिन्ना, नेहरू, इंदिरा, अटल बिहारी, मनमोहन, मोदी समेत कई नेता और जानी मानी हस्तियों पर अपने विचार लिखे हैं।


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