किसी फिल्म से कम नहीं है शीला दीक्षित की लव स्टोरी, अपनी किताब में किया था जिक्र

कॉमन फ्रेंड्स का रिश्ता सुलझाते हुए शीला दीक्षित को हुआ था प्यार, कुछ ऐसी रही थी लव स्टोरी

कांग्रेस की कद्दावर नेता और तीन बार दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित के आकस्मिक निधन से हर कोई हैरान है। साल 1998 से लेकर 2013 तक शीला दीक्षित लगातार दिल्ली की मुख्यमंत्री रहीं। उन्हें दिल्ली की राजनीति का सबसे बड़ा नेता माना जाता है। शीला दीक्षित के सियासी सफर से कमोबेश हर कोई अवगत है, लेकिन उनकी निजी जिंदगी के किस्सों के बारे में बहुत कम लोगों को ही मालूम है। शीला दीक्षित ने अपनी किताब ‘सिटीजन दिल्ली: माय टाइम्स, माय लाइफ’ में अपने जीवन के कुछ निजी और अंतरंगी लम्हों का जिक्र किया है। आइये जानते हैं ऐसा ही एक किस्सा

इस किताब में शीला दीक्षित ने अपने ‘लव लाइफ’ के बार में भी खुलकर लिखा है। उन्होंने बताया है कि कैसे उन्हें पहली नजर के प्यार को अपना जीवनसाथी बनाने के लिए 2 साल तक इंतजार करना पड़ा। शीला ने अपनी लव स्टोरी के बारे में लिखा कि प्राचीन भारतीय इतिहास का अध्ययन करने के दौरान ही उनकी मुलाकात विनोद से हुई। विनोद ही उनके पहले और आखिरी प्यार थे।


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किताब में उन्होंने लिखा है कि विनोद उनकी क्लास के 20 छात्रों में सबसे अलग थे। शीला लिखती हैं, “ऐसा नहीं है कि पहली नजर में ही प्यार हो गया था। वह काफी अलग-सा था। उसके प्रति मेरी पहली धारणा भी अलग-सी थी। पांच फीट साढ़े ग्यारह इंच लंबे विनोद सुंदर, सुडौल साथियों के बीच बेहद लोकप्रिय और अच्छे क्रिकेटर थे। संयोग से कॉमन फ्रेंड्स की लव लाइफ को सुलझाने के लिए हम दोनों ने मध्यस्थता की थी, लेकिन उस पंचायत के चक्कर में विनोद और मैं एक-दूसरे के काफी करीब आ गए।”

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शीला ने लिखा है कि इस घटना के कुछ दिन बाद उन्होंने अपने माता-पिता को विनोद के बारे में बताया था। लेकिन उनके मां-बाप शादी को लेकर आशंकित थे क्योंकि विनोद अभी भी स्टूडेन्ट हैं तो इनकी गृहस्थी कैसे चलेगी। इसके बाद मामला थोड़ा ठंडा पड़ गया। शीला ने मोतीबाग में एक दोस्त की मां के नर्सरी स्कूल में 100 रुपये की सैलरी पर नौकरी कर ली और विनोद सिविल सर्विसेज की तैयारी में लग गए। इन दिनों दोनों के बीच मुलाकात नहीं के बराबर होती थी। एक साल बाद 1959 में विनोद का सेलेक्शन भारतीय प्रशासनिक सेवा (आईएएस) के लिए हो गया और उन्होंने यूपी कैडर चुना।

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अपनी किताब में शीला ने लिखा है कि विनोद उत्तर प्रदेश के उन्नाव के कान्यकुब्ज ब्राह्मण परिवार से आते थे। उनके पिता उमाशंकर दीक्षित (जिन्हें लोग दादाजी कहते थे) स्वतंत्रता सेनानी, हिंदी भाषी और उच्च संस्कारों वाले थे। उमाशंकर दीक्षित इंदिरा गांधी मंत्रिमंडल में गृह मंत्री थे और बाद में कर्नाटक और पश्चिम बंगाल के राज्यपाल भी बने। दिल्ली के जनपथ के एक होटल में विनोद ने उनसे मुलाकात कराई थी तब वो काफी नर्वस थीं। हालांकि, दादाजी ने तब काफी सवाल पूछे थे और आखिर में खुशी जताई थी।

शीला लिखती हैं, “दादाजी ने कहा था कि उन्हें शादी के लिए दो हफ्ते, दो महीने या दो साल तक इंतजार करना पड़ सकता है क्योंकि विनोद की मां को इस अंतर्जातीय विवाह के लिए मनाना था और इसमें दो साल लग गए। आखिरकार 11 जुलाई, 1962 को दोनों की शादी हुई।

शीला दीक्षित के पति की एक कार दुर्घटना में कई साल पहले मौत हो गई थी। परिवार में उनके एक बेटे पूर्व सांसद संदीप दीक्षित और बेटी लतिका दीक्षित हैं, जिन्हें उन्होंने अकेले बड़ा किया।

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