पत्रकार ने पूछा- JNU में भाषा की पढ़ाई कर रहे गरीब परिवार के छात्रों को नौकरी मिलेगी क्या, मिला ये जवाब

पत्रकार ने पूछा- जेएनयू में भाषा की पढ़ाई कर रहे गरीब परिवार के छात्रों को नौकरी मिलेगी क्या, मिला ये जवाब

सोशल मीडिया पर कौन कब किस बात को लेकर ट्रोल हो जाए, कहना मुश्किल है। ताजा मामले में न्यूज़ एजेंसी एएनआई की एडिटर स्मिता प्रकाश ट्रोल हो गई हैं। स्मिता प्रकाश (Smita Prakash) जेएनयू (JNU) को लेकर किए गए कुछ ट्वीट्स के चलते ट्विटर यूजर्स के निशाने पर आ गईं। दरअसल, स्मिता प्रकाश ने जेएनयू में ‘भाषा’ की पढ़ाई कर रहे कमजोर आर्थिक पृष्ठभूमि के छात्रों के ऊपर टिप्पणी की थी।

अखबार की एक क्लिप शेयर करते हुए उन्होंने लिखा, आज के अखबार में कुछ जेएनयू छात्रों के प्रोफाइल का जिक्र है। मुझे आश्चर्य है कि सासाराम का एक युवक, जिसके पिता महीने में 6000 रुपये कमाते हैं, रसियन भाषा में मास्टर्स डिग्री लेना चाहता है, जिससे बमुश्किल ही नौकरी मिल पाती है। मैं ज्ञान के प्रति उनकी ललक को कमतर नहीं आंकती, बस जानने को उत्सुक हूँ।”



एक अन्य ट्वीट में उन्होंने लिखा,”या राजस्थान का एक युवक जिसका खेतिहर परिवार संकट से जूझ रहा हो और वह स्पैनिश पढ़ना चाहता है। क्या 3 साल में स्पैनिश भाषा में ली गई बैचलर डिग्री से उसे नौकरी मिलेगी? या फिर उत्तर प्रदेश की तंगहाली से जूझते परिवार के लड़के जो 3 साल से पश्तो और जर्मन पढ़ रहे हैं।

स्मिता प्रकाश के इन ट्वीट्स पर कई लोगों ने आपत्ति जताते हुए अपनी प्रतिक्रिया दी है। मिसाल के तौर पर श्रीनगर के डीएम शाहिद चौधरी ने कहा, “पश्तो के बारे में पता नहीं, लेकिन स्पैनिश, जर्मन और रशियन पढ़ने वाले युवकों के लिए काफी मौके हैं। कई कंपनियां अच्छी खासी सैलरी पर युवाओं को रोजगार देती हैं। मैं कुछ दोस्तों को भी जानता हूँ। विदेशों में भी मौके हैं।

एक अन्य आईएएस अधिकारी नवीन चंद्र ने स्मिता को जवाब देते हुए लिखा, “क्या बकवास है! मैं प्रयागराज के एक दलित लड़के को निजी रूप से जानता हूँ, जिसने जेएनयू से कोरियन भाषा की पढ़ाई की और आज माइक्रोसॉफ्ट में रहा है। लेकिन आपके अनुसार उसे सपने नहीं देखने चाहिए क्योंकि सपने सिर्फ बड़े शहरों के लोगों के लिए होते हैं। गज़ब!”

बॉलीवुड अभिनेता जीशान अयूब तंज के लहज़े में लिखते हैं, “सही बात की आपने। इन ग़रीब परिवार वालों की हिम्मत कैसे हुई अपनी मर्ज़ी का कुछ पढ़ने की? नौकर का बेटा या बेटी नौकर ही रहें तो अच्छा। ये हमारी बराबरी करने चले हैं? हुह!!! १०वीं के बाद नौकरी नहीं कर सकते क्या? बड़े आए!”

पत्रकार अखिल कुमार ने कहा, “ये साफ़ है कि आपको विदेशी भाषाओं के लिए नौकरियों के मौकों के बारे में कम पता है। मेरे एक दर्जन से ज्यादा दोस्त इस क्षेत्र में काम कर रहे हैं और इस नाते मैं आपको आश्वस्त कर सकता हूँ कि उनके पास हम पत्रकारों से ज्यादा संभावनाएं हैं।”

निखिल चौधरी नामक एक ट्विटर यूजर ने लिखा, “मैडम, विदेशी भाषाओं के लिए नौकरी के ढेर सारे अवसर हैं। मैनें साल 2005 में जेएनयू से अरबी भाषा में ग्रेजुएशन किया और दुबई की एक फर्म में चार साल नौकरी करने के बाद इंडिया लौट आया और रेमंड के साथ काम करने वाली एक कंपनी में काम कर रहा हूँ। मैं तो जेएनयू में राजनीतिक रूप से भी सक्रिय था।

ऋतु चौधरी ने इस मामले को लेकर अपने कुछ निजी अनुभव साझा किए हैं।

शाहनवाज़ नामक एक ट्विटर यूजर ने भी अपना निजी अनुभव साझा करते हुए बताया है कि एक मोटर मैकेनिक के घर में पैदा होने के बाद जेएनयू से फ्रेंच भाषा में बैचलर और मास्टर्स करने से कैसे उनकी जिंदगी बदल गई।


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