पुण्यतिथि: 20वीं सदी के ‘तानसेन’ थे उस्ताद गुलाम अली खां, लता और रफ़ी से 50 गुना ज़्यादा ली थी फीस

पुण्यतिथि: 20वीं सदी के 'तानसेन' थे उस्ताद गुलाम अली खां, लता और रफ़ी से 50 गुना ज़्यादा ली थी फीस

उस्ताद गुलाम अली खां भारतीय संगीत की दुनिया के बड़े नाम हैं। 20वीं सदी के ‘तानसेन’ के नाम से प्रसिद्ध बड़े गुलाम अली खां अपने समय के सर्वाधिक प्रतिभाशाली गायकों में से एक थे। अब्दुल करीम खान, अल्लादिया खान और फैयाज खाने के जमाने में भी संगीत की दुनिया में अपना नाम बनाने वाले गुलाम अली खान ने ज़िन्दगी के उतार- चढाव के बावजूद संगीत को नहीं छोड़ा और संगीत की दुनिया में अपनी एक अलग पहचान बनाई।

आज ही के दिन यानी 23 अप्रैल, 1968 को दुनिया को अलविदा कह चुके उस्ताद गुलाम अली खां ने संगीत के अपने छोटे से करियर में कई बुलंदियां हासिल की। विरासत में संगीत पाने वाले इस महान कलाकार की आवाज़ की चंचलता ने इन्हे दूसरे कलाकारों में एक ख़ास पहचान दिलाई।


शुरुआती जीवन

उस्ताद बड़े गुलाम अली खां का जन्म 2 अप्रैल, 1902 को पाकिस्तानी पंजाब के शहर लाहौर के पास स्थित केसुर गांव में हुआ था। पटियाला घराने में जन्मे उस्ताद बड़े गुलाम अली खां को संगीत विरासत में मिली थी। उनके पिता अली बख्श खां प्रसिद्ध सारंगी वादक और गायक थे और चाचा काले खां प्रसिद्ध गायक और संगीतज्ञ थे। उन्होंने संगीत की शिक्षा अपने चाचा से ली। 1947 में भारत के बंटवारे के बाद उस्ताद बड़े गुलाम अली खां लाहौर चले गए। उसके बाद वह भारत वापस आ गए और 1957 में उनको मोरारजी देसाई की मदद से भारत की नागरिकता मिल गई।

कैसा रहा 20वीं सदी के इस तानसेन का करियर?


सारंगी बजाकर और अपने चाचा के लिखे गीतों को गाकर अपने करियर की शुरुआत करने वाले उस्ताद गुलाम अली खां को पहचान 1938 में उनके पहले कॉन्सर्ट से मिली। कलकत्ता में हुए इस कॉन्सर्ट के बाद वह संगीत की दुनिया में अपनी पहचान बनाने में कामयाब हुए। ठुमरी को एक नयी पहचान दिलाने वाले उस्ताद गुलाम अली खां ने कई ठुमरी गाई जिनमें से ‘का करूं सजनी’, ‘आए न बालम’, ‘तिरछी नजरिया के बाण’, ‘याद पिया की आए’, ‘प्रेम जोगन बन के’, ‘नैना मोरे तरस रहे’, ‘कंकर मार जगाए’ उनकी प्रमुख हैं इस तरह उन्होंने ठुमरी को एक नई शैली दी उनका गाने का तरीका बहुत साधारण और लयदार होता था।

शुरू में फिल्मों में गाने से मना करने वाले उस्ताद गुलाम अली खां ने ‘मुगल-ए-आजम’ में अपनी आवाज़ दी। कहते हैं ‘मुगल-ए-आजम’ के निर्देशक आसिफ ने खां साहब को गाने के लिए अप्रोच किया तो इनकार करने की नीयत से बड़े गुलाम अली खान खां ने आसिफ से मेहनताने के तौर पर एक गाने के 25,000 रुपए मांगे ताकि वो पैसे सुन उनसे गाना न गवाएं। ये वो दौर था जब लता और रफी जैसे मशहूर गायकों को एक गाने का 500 से कम मिलता था लेकिन आसिफ ने खां साहब की मांग के मुताबिक पैसे दे कर उनसे गाना गवाया।

नई शैलीयों का ईजाद

उन्होंने ठुमरी में पंजाबी का टच देते हुए ‘ठुमरी का पंजाबंग’ शैली का ईजाद किया जो इस समय में भी लोकप्रिय है। उन्होंने परंपरागत फ्लेवर को बनाए रखते हुए ‘खयाल’ शैली की नई शैली का भी ईजाद किया।

निजी जीवन

उस्ताद बड़े गुलाम अली खां का विवाह अली जिवाई से 1932 में हुआ। 1930 में उनके बेटे मुनव्वर अली का जन्म हुआ जो आगे चल पिता की तरह महान शास्त्रीय गायक बने। वह 1968 में अपने पिता के निधन के समय तक हर कॉन्सर्ट में उनके साथ जाते थे।

निधन

संगीत की दुनिया के इस महान कलाकार का 23 अप्रैल, 1968 को हैदराबाद के बशीरबाग पैलेस में लम्बी बीमारी के चलते निधन हो गया। संगीत के प्रति उनका प्रेम इस बात से ही देखा जा सकता है कि लकवे का शिकार होने के बावजूद भी वह अपने बेटे मुनव्वर अली खां की मदद से गाते रहे।

पुरस्कार और सम्मान

उस्ताद बड़े गुलाम अली खां को 1962 में संगीत नाटक अकादमी अवॉर्ड और 1962 में पद्म भूषण से सम्मानित किया गया।

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