उपचुनाव के नतीजे से नहीं सधेगा सपा का मिशन 2022

लखनऊ, 30 अक्टूबर (आईएएनएस)| समाजवादी पार्टी (सपा) अभी हाल में हुए उपचुनाव में तीन सीटें जीतकर भले ही खुश हो, मगर सच तो यह है कि इसने जो सीटें जीती हैं, उसमें सपा का मर्जिन न के बराबर है। इन नतीजों के सहारे सपा का मिशन 2022 सधता नहीं दिख रहा है।

इस जीत में संगठन की कोई विशेष रणनीति नहीं दिखी। सिर्फ समीकरण और संयोग बने हैं, जिस कारण सपा को जीत मिली है। इस जीत में पार्टी का सत्ता विरोधी लहर और पार्टी के परफार्मेस दोनों का कोई योगदान नहीं दिखा है। इस चुनाव में प्रत्याशी का जनाधार तो दिखा, लेकिन पार्टी का कोई विशेष सहयोग नहीं दिखा।


उत्तर प्रदेश में हुए विधानसभा उपचुनाव की 11 सीटों में सर्वाधिक चर्चित सीट रामपुर ही थी। पूर्व कैबिनेट मंत्री आजम खां को भू-माफिया घोषित किया गया, और वह अभी भी 84 मुकदमों से राहत पाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। सपा मुखिया अखिलेश यादव विशेषकर इस सीट के लिए प्रचार भी करने गए।

आजम खां ने प्रचार के दौरान कई सभाओं में आंसू बहाए, तब जाकर उन्हें महज 7589 वोटों से जीत मिली है। पार्टी जिस हिसाब से आजम के पक्ष में कूदी थी, उस हिसाब से उनकी जीत का अंतर बढ़ना चाहिए था, लेकिन वह हुआ नहीं।

साल 2017 में आजम ने यहां पर 1,02100 वोट पाकर बड़ी जीत दर्ज की थी। तब भाजपा को यहां से महज 25.84 प्रतिशत वोट मिले थे। जबकि भाजपा ने इस उपचुनाव में 44.34 प्रतिशत वोट हासिल किया है। उसके वोट प्रतिशत में करीब 20 प्रतिशत का इजाफा हुआ है। इस बार तो उसकी तैयारी फतह करने की थी लेकिन सफलता नहीं मिली। भाजपा को रामपुर में अपनी जमीन बनाने का मौका जरूर मिल गया है।


अगर जैदपुर सीट पर देखें तो सपा प्रत्याशी गौरव रावत 78,172 मत पाकर 4,165 मतों के अंतर से चुनाव जीते। पहले चरण से लेकर 10वें चरण तक भाजपा व कांग्रेस प्रत्याशी के मध्य कांटे की टक्कर रही। इसके बाद भाजपा और सपा में शुरू हुई रस्साकसी अंतिम समय तक जारी रही। यहां पर कांग्रेस के प्रत्याशी तनुज पुनिया द्वारा भाजपा के वोटो पर सेंधमारी, मसौली और सिद्धौर ब्लॉक भाजपा के गढ़ पर ज्यादा वोट न मिलना हार का कारण बना और इसी का फायदा सपा को मिला।

जलालपुर सीट पर सपा को काफी मशक्कत करनी पड़ी है। बसपा प्रत्याशी लगातार बढ़त बनाए हुई थीं। यहां उनकी टक्कर भाजपा प्रत्याशी से दिख रही थी, लेकिन आखिरी राउंड आते-आते सपा प्रत्याशी ने बढ़त बनाकर जीत अपनी झोली में डाल ली।

सपा के सुभाष राय (72,589) बसपा की डॉ. छाया वर्मा (71,813) पर सिर्फ 776 मतों से जीत दर्ज कर पाए थे। यहां पर सपा और बसपा को लगभग 35 -35 मत प्रतिशत हासिल हुए हैं।

वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक राजीव श्रीवास्तव ने कहा, “जब चुनाव में कम समय बचा हो तब कोई उपचुनाव हो तो सेमीफाइनल माना जाता है। अभी इसे सेमीफाइनल कहना ठीक नहीं है। सपा जिस प्रकार 2017 व 19 में लगातार हार रही थी, ऐसे में इन तीन सीटों पर जीत उत्साहजनक और कार्यकर्ताओं में जोश भरने वाली है। लेकिन पार्टी की रणनीति के हिसाब से सपा इसे बड़ी विजय मानने की भूल न करे।”

उन्होंने कहा कि यह विजय सपा संगठन, पार्टी कार्यकर्ता की वजह से कम दिख रही है। जैसा समीकरण रहा है, उसमें दो प्रत्याशी अच्छा लड़ गए तो तीसरे वाले ने फायदा उठा लिया। अगर पार्टी के परफार्मेस की जीत होती तो आजम खां की सीट का मर्जिन घटता क्यों!

यह समीकरण और संयोग तीनों सीटों पर देखे गए। भाजपा ने 11 में से 8 सीटें जीती हैं, इसलिए इसे सत्ता विरोधी लहर भी नहीं कहा जा सकता। अब सपा को जरूरत है कि पार्टी कार्यकर्ताओं का उत्साह बरकार रखे, संगठन का पुनर्गठन करे। सोशल इंजीनियरिंग का फार्मूला अब हर पार्टी को अपनाना होगा।

 

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