भारत का चुनावी इतिहास और दशक दर दशक बदलती राजनीति

भारत का चुनावी इतिहास और दशक दर दशक बदलती राजनीति

अपनी जटिल भू-राजनीतिक परिस्थितियों और लंबे इतिहास के बोझ तले दबे भारत में लोकतंत्र की स्थापना अपनेआप में एक दुर्लभ उपलब्धि है। भारतीय संविधान के शिल्पकारों ने इसके निर्माण में साहस का परिचय देते हुए उन मुद्दों को छुआ, जिन तक पहुँचने में दुनिया के दूसरे लोकतंत्रों को कई साल लग गए थे। सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार ने देश में सामाजिक न्याय की पहल करते हुए एक समतावादी लोकतंत्र की धुरी तैयार की। विभाजन के दंश और व्यापक निरक्षरता को झेलते हुए देश के सभी नागरिकों को मतदान करने और सरकार चुनने का अधिकार मिला। 70 साल पुराने लोकतंत्र में आज इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों (ईवीएम) के ज़रिये मतदान प्रक्रिया की विश्वसनीयता पर सवाल उठाए जा रहे हैं। लोकतंत्र तक पहुँचने वाली इस पथरीली राह पर चलने और इसे समझने लिए हमें यादों के झरोखों में झांकना जरूरी है।

1950 का दशक

पचास के दशक में भारत एक उभरता हुआ लोकतंत्र था। देश को आजादी दिलाने वाली पार्टी कांग्रेस केंद्र की सत्ता पर काबिज थी। 1952 में हुए पहले आम चुनाव की दिलचस्प बात ये थी कि इसमें उम्मीदवारों के  नाम और पार्टी के चिह्नों वाले मतपत्रों का उपयोग नहीं किया गया था। बल्कि प्रत्येक उम्मीदवार के लिए अलग-अलग बक्से आवंटित किए गए थे। जिनमें मतदाताओं ने अपना मत दिया था। कई सारे आजादी के नायकों के कांग्रेस में होने के बावजूद, 1952 में कांग्रेस को लगभग 45% वोट मिले और 1957 के चुनावों में 47% वोट ही मिल सके।


अगर भारत में फर्स्ट पास्ट द पोस्ट (FPTP) सिस्टम के बजाय एक प्रॉपर रिप्रेजेंटेशन (PR) सिस्टम होता, तो हमारे देश में आरंभ से ही गठबंधन सरकारें होती। कांग्रेस पार्टी के बाद दूसरी सबसे बड़ी पार्टी भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी हुआ करती थी, जिनका आपस में गठबंधन हो नहीं सकता था। कांग्रेस के बाद स्वतंत्रता सेनानियों का सबसे बड़ा समूह स्वतंत्रता पार्टी में था। इस दौर में राजनीतिक प्रतिस्पर्धा भी काफी हद तक आंतरिक हुआ करती थी। तब नेहरू के समाजवाद के खिलाफ स्वतंत्रता पार्टी की फ्री मार्केट इकॉनमी मुकाबले में थी।

1960 का दशक

साठ के दशक में भारत की राजनीति ने नया मोड़ लेना शुरू किया। पहली बार राज्य और केंद्र की सत्ता में अलग-अलग पार्टियों की सरकार बननी शुरू हुई। चीन युद्ध और नेहरू-शास्त्री के निधन ने इंदिरा गांधी को राष्ट्रीय राजनीति की पहली पंक्ति में ला खड़ा किया। वैकल्पिक दलों के रूप में जेडी, बीजेएस, कम्युनिस्ट और दक्षिण भारत के क्षेत्रीय दल उभरकर सामने आये और इन्होने चुनावी राजनीति में भी अपनी छाप छोड़ी। 1962 में कांग्रेस का वोट शेयर 45% पर स्थिर रहा। 1967 में एक नया राजनीतिक प्रयोग हुआ। पहली बार “कांग्रेस-विरोधी” पार्टियां एकजुट होने से कांग्रेस के वोट शेयर में कमी आने लगी।

कई राज्यों में कांग्रेस के हाथ से सत्ता फिसलने लगी। हालांकि, इंदिरा गांधी ने लोकसभा चुनाव तो जीत लिया, लेकिन पहली बार कांग्रेस का वोट शेयर गिरकर 41% और सीटों की संख्या 300 के नीचे आ गई। सी राजगोपालाचारी के नेतृत्व में मुक्त बाजार अर्थव्यवस्था की वकालत करने वाली स्वतंत्र पार्टी, कम्युनिस्टों को पछाड़ कर मुख्य विपक्षी दल बन गई। इस राजनीतिक परिवर्तन ने इंदिरा गांधी को और भी आक्रामक समाजवादी नीतियों को लागू करने के लिए मजबूर किया।


1970 का दशक

1971 के चुनाव में मोरारजी देसाई के नेतृत्व में कांग्रेस (ओ) के गठन के साथ कांग्रेस पार्टी में पहली बार विभाजन हुआ। यह विभाजन इंदिरा गांधी की कांग्रेस में सेंध लगाने में विफल रहा। इस दशक को पाकिस्तान के पतन, इंदिरा गांधी के उद्भव, सोवियत नीतियों और आपातकाल लगाने के प्रभाव के लिए याद किया जाता है । 1977 के चुनाव भारतीय चुनावी इतिहास में ऐतिहासिक थे। आपातकाल ने पूरे विपक्ष को जनता पार्टी के रूप में एकजुट कर दिया,  जिसके चलते इन चुनावों में कांग्रेस की करारी हार हुई।

1980 का दशक

जनता पार्टी के विफल प्रयोग ने इंदिरा गांधी को 1980 के चुनाव के बाद सत्ता में वापस ला दिया। उन्हें लगभग 1971 जैसा ही जनादेश मिला। पंजाब, कश्मीर, पूर्वोत्तर और श्रीलंका में विद्रोह जैसी घटनाओं ने भारतीय राजनीति को एक हिंसक मोड़ दिया। इंदिरा गांधी की हत्या के बाद, कांग्रेस ने 1984 के चुनावों में 48% वोट और 400 से अधिक सीटों पर जीत हासिल की। बीजेपी तब अस्तित्व में आ चुकी थी। वोट शेयर के हिसाब से तो बीजेपी दूसरे स्थान पर रही। लेकिन, 7.4 फीसदी वोट के साथ बीजेपी महज दो सीट ही अपनी झोली में डाल पायी।

श्रीमती गांधी की हत्या के साथ राजीव गांधी का युग शुरू हुआ  और एक घोटाले की भेंट चढ़कर एकाएक समाप्त हो गया। 1980 और 1984 के चुनावों में  कांग्रेस ने जिस जबरदस्त जनादेश के साथ सत्ता में वापसी की थी, उसका अंत 1989 में वीपी सिंह के नेतृत्व में केंद्र की दूसरी गैर-कांग्रेसी सरकार बनने के साथ हुआ। जनता दल के रूप में जनता पार्टी (माइनस बीजेपी) का प्रयोग दोहराया गया और कांग्रेस दूसरी बार 200 सीटों के आंकड़े से नीचे खिसक गई। आखिरकार, भाजपा को सफलता हाथ लगी और पार्टी को 85 सीटों पर जीत हासिल हुई।

1990 का दशक

राष्ट्रवादी और दक्षिणपंथी पार्टियों के मजबूत होने का दौर शुरू हुआ। पीवी नरसिम्हा राव सरकार में वित्त मंत्री मनमोहन सिंह ने अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) के अनुदेशों  के अनुसार देश की अर्थव्यवस्था का उदारीकरण किया। 1991 में चुनाव प्रचार के दौरान राजीव गांधी की दुखद हत्या हो गयी। लोकसभा चुनाव के बाद कांग्रेस सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी, लेकिन उसे अल्पमत की सरकार चलानी पड़ी।

1996 के चुनाव में सीटों के लिहाज से सबसे बड़ी पार्टी के रूप में बीजेपी का उदय हुआ और 1998 में सत्ता में 13 दिन की सरकार बनाने के बाद गठबंधन के युग की शुरुआत हुई। पोखरण परमाणु परीक्षण और कारगिल विजय ने बीजेपी की साख को मजबूत किया। 1999 के चुनावों में पूर्ण बहुमत के साथ पहली बार भाजपा-नीत एनडीए सरकार देखी गई। यह पांच साल का कार्यकाल पूरा करने वाली पहली गैर-कांग्रेसी सरकार भी बनी।

2000 का दशक

2004 के चुनाव में भाजपा की चौंकाने वाली हार ने केंद्र की सत्ता में कांग्रेस के नेतृत्व वाले संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन का मार्ग प्रशस्त किया। यूपीए ने आर्थिक वृद्धि के लाभ का पुनर्वितरण नीतियों और उच्च विकास दर की बदौलत 2009 में फिर से जीत हासिल की। इस दशक में देश ने कई आतंकवादी हमले और परस्पर विरोधी विचारधारा के बीच कई राजनीतिक उठा-पठक देखे। एनडीए के इंडिया शाइनिंग अभियान की हार ने भारत की जमीनी हकीकत को उजागर कर दिया और इसने यूपीए को समाजवादी नीतियां बनाने के लिए मजबूर किया।

2000 का दशक

2004-2014 की कांग्रेस-नीत सरकार में बड़े-बड़े भ्रष्टाचार के कई मामले सामने आये, जो गठबंधन की राजनीति या TINA फैक्टर (कोई विकल्प नहीं है) के नकारात्मक पहलू माने जाते हैं। इस राजनीतिक हलचल के बीच हिंदुत्व के सबसे बड़े चेहरे के रूप में नरेंद्र मोदी चमके और 1984 के बाद पहली बार किसी पार्टी को अकेले स्पष्ट बहुमत मिला।

2014 में जहां एक ओर कांग्रेस अपने इतिहास में सबसे कम 44 सीटों पर सिमट गई, तो वहीं भाजपा ने 282 सीटें हासिल कर अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन किया।

चुनाव प्रचार

चुनाव प्रचार के संदर्भ में देखा जाए तो राजनीतिक पार्टियों का वोटरों से संवाद करने के तरीके में बड़ा बदलाव आ चुका है। पहले राष्ट्रीय और क्षेत्रीय दलों को दूरदर्शन और आकाशवाणी जैसे माध्यमों पर तय समय मिला करता था और अब पार्टियांआर्टीफिशियल इंटेलिजेंस का धड़ल्ले से इस्तेमाल कर रही हैं।

1984 में लोगों ने इलेक्ट्रॉनिक युग की पहली झलक देखी। पहली बार इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों से लेकर विश्लेषकों और टीवी मीडिया द्वारा चुनाव का कवरेज देखा गया।1990 के दशक में इलेक्ट्रॉनिक और प्रिंट मीडिया की भरमार हो गई। जिससे प्रतिस्पर्धी राष्ट्रीय राजनीति को प्रसार के लिए कई समुचित माध्यम मिले। मुख्यधारा की मीडिया का प्रभाव 2009 में बढ़ा। मीडिया के पक्षपातपूर्ण होने के आरोपों के बीच सोशल मीडिया युग का आरंभ हुआ। भाजपा ने इसे सबसे पहले भुनाया और शुरूआती दौर में सोशल मीडिया प्लेटफार्म पर बीजेपी समर्थक हावी थे, लेकिन अब सभी पार्टियों ने यहाँ अपनी अच्छी-खासी उपस्थिति दर्ज कर ली है। निकट भविष्य में हम मीडिया के और भी संवर्धित स्वरूप देख सकते हैं।

आखिर में चुनाव आयोग के लिए दो शब्द

अपनी स्थापना से ही भारतीय निर्वाचन आयोग दुनिया के सबसे बड़े चुनाव सफलतापूर्वक आयोजित करता आ रहा है। चुनाव आयोग के कुशल प्रबंधन में संपन्न 2014 के लोकसभा चुनाव में 80 करोड़ से अधिक मतदाताओं ने वोट डाले। टीएन शेषन के दौर में चुनाव आयोग सशक्त हुआ और तब से चुनाव स्वतंत्र, निष्पक्ष और सत्ता के प्रभुत्व से दूर होते चले गए हैं। अब 2019 में एक और ऐतिहासिक चुनाव की बारी है। बधाई।


यह लेख मशहूर चुनाव विश्लेषक यशवंत देशमुख ने लिखा है जो फर्स्ट पोस्ट पर अंग्रेजी में प्रकाशित हो चुका है। लेखक की स्वीकृति से इसका हिंदी अनुवाद न्यूज्ड हिंदी पर प्रकाशित किया गया है।

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